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आखिर क्यों हर अहंकारी व्यक्ति धीरे-धीरे हो जाता है अकेला और अप्रिय ? वीडियो में जाने अहंकार कैसे रिश्तों में घोलता है ज़हर

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अहंकार यानी ‘मैं’ की भावना जब सीमाओं को पार कर जाती है, तो वह व्यक्तित्व का सबसे बड़ा दुश्मन बन जाती है। कोई भी इंसान चाहे कितना भी बुद्धिमान, सक्षम या समृद्ध क्यों न हो, यदि उसके व्यवहार में अहंकार आ जाए, तो धीरे-धीरे उसके अपने ही लोग उससे कटने लगते हैं। यह एक ऐसा सत्य है जिसे समय-समय पर जीवन, धर्म और इतिहास सभी ने प्रमाणित किया है।प्राचीन ग्रंथों से लेकर आधुनिक मनोविज्ञान तक, सभी इस बात को स्वीकार करते हैं कि अहंकार एक व्यक्ति को सामाजिक और आत्मिक दोनों स्तरों पर कमजोर बनाता है। ऐसे व्यक्ति से पहले उसके मित्र, फिर परिवार और अंत में सहयोगी भी दूर होने लगते हैं। इस लेख में हम समझेंगे कि ऐसा क्यों होता है, इसके पीछे क्या कारण हैं और इससे बचने के उपाय क्या हो सकते हैं।

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क्या होता है अहंकार?
अहंकार का अर्थ है – अपनी योग्यता, शक्ति या स्थान को आवश्यकता से अधिक महत्व देना और दूसरों को तुच्छ समझना। अहंकार व्यक्ति को यह विश्वास दिला देता है कि वह ही श्रेष्ठ है और दूसरों की बातों, भावनाओं या सुझावों का कोई मोल नहीं। यह सोच धीरे-धीरे व्यवहार में झलकने लगती है, जिससे सामने वाला व्यक्ति अपमानित महसूस करता है।अहंकारी व्यक्ति को लगता है कि उसे किसी की सलाह या मदद की जरूरत नहीं है। वह हर बात में खुद को सही और बाकी सभी को गलत मानता है। यही मानसिकता रिश्तों में दरार की शुरुआत बन जाती है।

लोग अहंकारी व्यक्ति से दूर क्यों होने लगते हैं?
सम्मान की कमी महसूस होना

जब कोई व्यक्ति हर समय खुद को बड़ा और दूसरों को छोटा दिखाने की कोशिश करता है, तो सामने वाला खुद को अपमानित महसूस करता है। कोई भी व्यक्ति ऐसी स्थिति में लंबे समय तक नहीं रहना चाहता जहाँ उसका आत्म-सम्मान बार-बार आहत हो।

संबंधों में संवाद की कमी
अहंकार संवाद को बंद कर देता है। जब किसी को लगता है कि सामने वाला सिर्फ अपनी ही बात मानवाना चाहता है और दूसरों की बात सुनना नहीं चाहता, तो वह व्यक्ति धीरे-धीरे चुप हो जाता है और अंततः उस संबंध से दूरी बना लेता है।

टीम वर्क में बाधा
चाहे वह परिवार हो, कार्यस्थल हो या मित्र मंडली – हर जगह सामूहिक सहयोग की जरूरत होती है। लेकिन अहंकारी व्यक्ति हमेशा खुद को केंद्र में रखता है और दूसरों की भूमिका को नकारता है। इससे टीम वर्क प्रभावित होता है और लोग ऐसे व्यक्ति के साथ काम करने से कतराने लगते हैं।

ईर्ष्या और नफरत का जन्म
अहंकारी व्यक्ति का रवैया दूसरों के मन में उसके प्रति ईर्ष्या, असंतोष और घृणा की भावना पैदा करता है। वह भले ही खुद को सफल माने, लेकिन समाज और अपने करीबी उसे एक आत्ममुग्ध और असहज व्यक्ति के रूप में देखने लगते हैं।

भावनात्मक जुड़ाव की कमी
रिश्ते भावनाओं पर टिके होते हैं। लेकिन जब किसी में ‘मैं’ का भाव इतना अधिक होता है कि वह दूसरों की भावनाओं को समझने या महत्व देने की कोशिश ही नहीं करता, तो स्वाभाविक है कि भावनात्मक दूरी बन जाती है।

धार्मिक दृष्टिकोण से अहंकार
हिंदू धर्म और अन्य धार्मिक ग्रंथों में अहंकार को सबसे बड़ा शत्रु बताया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं – “अहंकार से ग्रसित व्यक्ति न धर्म समझ पाता है, न भक्ति कर पाता है और न ही आत्मज्ञान की ओर बढ़ पाता है।” रामायण में रावण और महाभारत में दुर्योधन, दोनों के पतन का मूल कारण अहंकार ही था।

धर्म यह भी सिखाता है कि विनम्रता और सेवा भाव ही सच्चे मनुष्य के गुण हैं। जहां अहंकार होता है, वहां ईश्वर नहीं टिकता।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण
मनोविज्ञान के अनुसार, अहंकारी व्यक्ति के भीतर असुरक्षा छिपी होती है। वह अपनी कमजोरी को छुपाने के लिए एक मजबूत और श्रेष्ठ व्यक्तित्व का मुखौटा पहनता है। हालांकि वह खुद को शक्तिशाली दिखाने की कोशिश करता है, लेकिन अंदर से वह भय और अकेलेपन का शिकार होता जाता है। इसलिए उसका व्यवहार आक्रामक, आलोचनात्मक और नियंत्रित करने वाला हो जाता है।

इससे बचने के उपाय
आत्मनिरीक्षण करें – नियमित रूप से खुद से सवाल पूछें कि क्या आप दूसरों की बातों को सुनते हैं? क्या आप सबके योगदान को महत्व देते हैं?
ध्यान और साधना करें – योग, ध्यान और प्रार्थना के माध्यम से अहंकार पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
विनम्रता को अपनाएं – दूसरों की भावनाओं और विचारों का सम्मान करें। विनम्रता को कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति समझें।
सीखने की आदत रखें – हर किसी से कुछ सीखने को मिलता है, यह भाव आपके भीतर से अहंकार को कम करेगा।

अहंकार, रिश्तों की नींव को खोखला कर देता है। यह हमें धीरे-धीरे अपनों से दूर कर देता है, चाहे वो परिवार हो, मित्र हों या सहयोगी। यह सिर्फ सामाजिक दूरी नहीं, बल्कि आत्मिक अकेलापन भी लेकर आता है। इसलिए जरूरी है कि हम समय रहते चेतें, अपने व्यवहार का मूल्यांकन करें और विनम्रता को जीवन में उतारें। क्योंकि अंत में, वही व्यक्ति सच्चे रिश्तों और सम्मान का हकदार होता है जो दूसरों के साथ समानता और सम्मान का भाव रखता है, न कि अहंकार का।

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