मानव जीवन में अहंकार एक ऐसी भावना है जो अक्सर व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में कई बाधाएं उत्पन्न कर देती है। आधुनिक समय में यह समस्या अधिकतर लोगों के लिए चिंता का विषय बन चुकी है। मशहूर आध्यात्मिक गुरु ओशो ने अहंकार की उत्पत्ति और उसके मूल कारणों पर गहन विचार किया है। उनके अनुसार, अहंकार केवल अहं की भावना नहीं है, बल्कि यह हमारी मानसिक संरचना और जीवन अनुभवों का परिणाम है।
ओशो का मानना है कि अहंकार मुख्य रूप से असुरक्षा और आत्म-संदेह से उत्पन्न होता है। जब व्यक्ति अपने भीतर किसी प्रकार की कमी महसूस करता है, जैसे कि प्यार, स्वीकृति या सम्मान की कमी, तब वह अपने आप को दूसरों से श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश करता है। यह प्रयास धीरे-धीरे अहंकार का रूप ले लेता है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति अपने मूल्य और क्षमताओं के वास्तविक आकलन से दूर हो जाता है और एक नकली आत्म-महत्त्व की भावना का शिकार बनता है।
दूसरा मुख्य कारण ओशो के अनुसार है सामाजिक तुलना और प्रतिस्पर्धा। आज के युग में लोग अक्सर अपने जीवन को दूसरों के जीवन से तुलना करते हैं। सोशल मीडिया और बाहरी प्रभाव के कारण व्यक्ति अपने आप को दूसरों के स्तर पर आंकने लगता है। यह तुलना व्यक्ति में असंतोष और अहंकार दोनों को जन्म देती है। ओशो बताते हैं कि जब व्यक्ति लगातार खुद को दूसरों से बेहतर साबित करने में जुटा रहता है, तब उसका अहंकार बढ़ता है और मानसिक शांति बाधित होती है।
ओशो ने यह भी स्पष्ट किया कि भूतकाल के अनुभव और बचपन की परिस्थितियां अहंकार के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कई बार माता-पिता की अत्यधिक आलोचना या अपर्याप्त प्यार, बच्चे में एक खालीपन और आत्म-सम्मान की कमी पैदा कर देती है। जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, यह कमी उसके व्यक्तित्व में अहंकार के रूप में प्रकट होती है। ओशो के अनुसार, यह अहंकार व्यक्ति की संवेदनशीलता और दूसरों के प्रति सहानुभूति को भी प्रभावित करता है।
एक और कारण है भौतिकता और बाहरी सफलता का मोह। आज के दौर में व्यक्ति अक्सर संपत्ति, पद और प्रतिष्ठा के पीछे दौड़ता है। ओशो मानते हैं कि जब व्यक्ति अपने मूल्य का निर्धारण केवल बाहरी उपलब्धियों से करता है, तो यह अहंकार को पोषण देता है। इससे वह न केवल अपने अंदर की सच्चाई से कट जाता है, बल्कि दूसरों के साथ रिश्तों में भी दूरी पैदा करता है।
ओशो इस बात पर जोर देते हैं कि अहंकार से मुक्त होने के लिए स्व-ज्ञान, ध्यान और आत्म-संवेदनशीलता आवश्यक है। व्यक्ति को यह समझना होगा कि उसकी वास्तविक शक्ति और मूल्य बाहरी दुनिया की तुलना में आंतरिक संतुलन और समझ में निहित है। नियमित ध्यान, आत्म-निरीक्षण और दूसरों के प्रति सहानुभूति विकसित करना अहंकार को कम करने के प्रभावी उपाय हैं।








