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किस प्रकार के लोग होते अहंकारी ? वायरल वीडियो में जानिए उनकी पहचान और खुद को कैसे रखे उनसे दूर ?

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अहंकार एक ऐसा भाव है जो किसी भी व्यक्ति को आत्मविनाश की ओर ले जा सकता है। यह एक सूक्ष्म मानसिक विकार की तरह होता है जो धीरे-धीरे व्यक्ति की सोच, व्यवहार और संबंधों को प्रभावित करता है। आमतौर पर अहंकारी व्यक्ति खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझता है और यह मान बैठता है कि वह हर स्थिति में सही है। यह प्रवृत्ति न केवल व्यक्ति को समाज से काट देती है, बल्कि उसकी आंतरिक शांति और मानसिक संतुलन को भी नष्ट कर देती है।

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किस प्रकार के लोगों में होता है अहंकार?
अहंकार किसी खास वर्ग, शिक्षा, आयु या सामाजिक स्तर से जुड़ा नहीं होता, लेकिन कुछ विशेष प्रवृत्तियों वाले व्यक्तियों में यह अधिक देखने को मिलता है। आइए जानते हैं कौन से लोग अधिक अहंकार से ग्रसित होते हैं:

अति-प्रशंसा पाने वाले लोग
जो लोग बचपन से या किसी विशेष सामाजिक या पारिवारिक स्थिति के कारण हर समय प्रशंसा के घेरे में रहते हैं, उनके भीतर धीरे-धीरे ‘मैं श्रेष्ठ हूं’ की भावना जन्म लेती है। यह भावना समय के साथ अहंकार में बदल जाती है। उन्हें लगता है कि वे गलती कर ही नहीं सकते, और हर परिस्थिति में उनकी बात ही अंतिम होनी चाहिए।

अत्यधिक सफल और प्रसिद्ध लोग
कुछ लोग जब करियर, धन या सामाजिक प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंचते हैं, तो उन्हें लगता है कि उन्होंने सब कुछ अपनी मेहनत से प्राप्त किया है और अब उन्हें किसी की आवश्यकता नहीं। यह आत्मगौरव धीरे-धीरे अहंकार का रूप ले लेता है। वे दूसरों को तुच्छ समझने लगते हैं और आलोचना सहन नहीं कर पाते।

धनवान व्यक्ति
चाणक्य के अनुसार, अत्यधिक धनवान लोग अक्सर अहंकार से भर जाते हैं। उन्हें लगता है कि उनका पैसा ही सब कुछ है और वे दूसरों से श्रेष्ठ हैं।

शक्ति संपन्न व्यक्ति
जो लोग शक्ति और अधिकार के पदों पर होते हैं, जैसे राजा, मंत्री या अधिकारी, उनमें अहंकार जल्दी आता है। उनकी स्थिति उन्हें ऐसा महसूस कराती है कि वे सब कुछ कर सकते हैं।

ज्ञान या शक्ति का भ्रम पालने वाले व्यक्ति
जिन लोगों को लगता है कि उन्हें हर विषय का ज्ञान है या वे सत्ता में हैं, वे अक्सर दूसरों को कमतर आंकते हैं। ऐसे लोग सलाह देना पसंद करते हैं, लेकिन सुनना नहीं। उन्हें लगता है कि उनका अनुभव या ज्ञान अंतिम सत्य है। यह मानसिकता अहंकार को जन्म देती है।

धार्मिक या आध्यात्मिक स्थिति का दुरुपयोग करने वाले
कुछ लोग जब धर्म, योग या अध्यात्म की साधना करते हैं, तो वे खुद को साधारण जनों से श्रेष्ठ मानने लगते हैं। यह ‘मैं ज्ञानी हूं, तुम अज्ञानी हो’ की भावना उन्हें आध्यात्मिक अहंकार की ओर ले जाती है, जो कि सामान्य अहंकार से कहीं अधिक खतरनाक होता है।

अहंकारी व्यक्ति की पहचान कैसे करें?
अहंकारी व्यक्ति की पहचान उसके शब्दों और व्यवहार से आसानी से की जा सकती है, बशर्ते आप उसे ध्यान से देखें। नीचे कुछ ऐसे लक्षण बताए गए हैं जो किसी व्यक्ति के अहंकारी होने की पुष्टि करते हैं:

हमेशा खुद की बातों को सही ठहराना
अहंकारी व्यक्ति कभी यह नहीं मानता कि वह गलत हो सकता है। उसे लगता है कि उसकी सोच, राय और दृष्टिकोण सबसे श्रेष्ठ है। वह अक्सर दूसरों की बातों को नकारता है या काटता है।

दूसरों को नीचा दिखाना
ऐसे व्यक्ति अपने व्यवहार या शब्दों से दूसरों को तुच्छ सिद्ध करने की कोशिश करते हैं। वे दूसरों की उपलब्धियों को कम आंकते हैं और स्वयं की प्रशंसा करते हैं।

आलोचना से चिढ़ना
अहंकारी लोग आलोचना को सहन नहीं कर पाते। वे तुरंत रक्षात्मक हो जाते हैं या पलटवार करते हैं। आलोचना उन्हें निजी अपमान जैसा लगता है, चाहे वह कितनी भी विनम्रता से क्यों न की गई हो।

सुनने की क्षमता की कमी
ये लोग केवल बोलना चाहते हैं, लेकिन सुनना नहीं। उन्हें लगता है कि सामने वाला कुछ नया नहीं बता सकता, इसलिए वे दूसरों की बातों को बीच में ही काट देते हैं या अनदेखा कर देते हैं।

हमेशा ध्यान का केंद्र बने रहना
अहंकारी व्यक्ति को यह बर्दाश्त नहीं होता कि कोई और सुर्खियों में हो। वे हमेशा चाहते हैं कि सभी की नजरें उन्हीं पर रहें, चाहे वह किसी भी माध्यम से क्यों न हो – बातचीत, सोशल मीडिया या सार्वजनिक मंच।

अहंकार से कैसे बचा जाए?
अहंकार से बचने के लिए आत्मचिंतन और विनम्रता जरूरी है। हर व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि ज्ञान, धन, प्रतिष्ठा या अनुभव सब कुछ अस्थायी हैं। दूसरों की बातों को सुनना, उनकी भावनाओं का सम्मान करना और अपनी गलतियों को स्वीकार करना एक संतुलित व्यक्ति की पहचान होती है। अहंकार छोड़कर विनम्रता अपनाना न केवल व्यक्ति को मानसिक शांति देता है, बल्कि सामाजिक संबंधों को भी मजबूत बनाता है।

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