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जब रिश्तों में ‘हम’ की जगह ‘मैं’ ले लेता है तब कैसे बिखरने लगता है पूरा परिवार, वायरल वीडियो में जाने इससे बचने के मनोवैज्ञानिक तरीके

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हम सभी के जीवन में “रिश्ते” सबसे अहम होते हैं। ये रिश्ते ही हमें सहारा देते हैं, हमारी पहचान बनाते हैं और जीवन के हर मोड़ पर हमारे साथ होते हैं। लेकिन जब इन्हीं रिश्तों में किसी एक व्यक्ति का अहंकार प्रवेश कर जाता है, तो वही रिश्ता धीरे-धीरे टूटने लगता है। परिवार, जो प्रेम, त्याग और समझदारी की नींव पर टिका होता है, उसमें अगर “मैं” और “मेरे अहम” को प्राथमिकता दी जाने लगे, तो संबंधों की जड़ें हिल जाती हैं।

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अहंकार: एक चुपचाप घुन की तरह
अहंकार कोई अचानक पैदा होने वाली चीज़ नहीं होती। यह धीरे-धीरे पनपता है—थोड़ा सम्मान मिलने पर, पद या पैसे में वृद्धि होने पर, या जब कोई खुद को सबसे ज्यादा समझदार मानने लगता है। यह सोच कि “मेरे बिना तो कुछ होता ही नहीं”, “मैं सही हूं, बाकी सब गलत हैं”—यही अहंकार के बीज होते हैं। और जब यह रवैया घर के अंदर अपनाया जाता है, तब रिश्ते दम घुटने लगते हैं।

परिवार में अहंकार के असर
संवाद में कमी:

जब व्यक्ति अपने विचारों को ही सर्वोपरि मानने लगे, तो वो दूसरों की बातें सुनना बंद कर देता है। बातचीत में कटाक्ष, उपेक्षा या एकतरफा फैसले आने लगते हैं। इससे पारिवारिक संवाद कमजोर होता है।

सम्मान का अभाव:
अहंकारी व्यक्ति अक्सर परिवार के अन्य सदस्यों को कमतर समझता है। उनकी सलाह को नजरअंदाज करता है या खुले तौर पर उनकी आलोचना करता है। इससे सामने वाले के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है।

भावनात्मक दूरी:
जब बार-बार किसी को दबाया जाता है, उसकी बातों को तवज्जो नहीं दी जाती, तो वह खुद को अकेला और उपेक्षित महसूस करता है। पति-पत्नी, भाई-बहन या माता-पिता और बच्चों के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ने लगती है।

परिवार में तनाव और कलह:
अहंकार के चलते छोटे-छोटे मुद्दे भी बड़े विवाद में बदल जाते हैं। कोई झुकने को तैयार नहीं होता, क्योंकि हर किसी को अपनी बात ‘ठीक’ लगती है। इससे घर का वातावरण अशांत हो जाता है।

बुजुर्गों की उपेक्षा:
आजकल कई परिवारों में युवा वर्ग अपनी सोच को सबसे ऊँचा मानने लगा है। बुजुर्गों की सलाह को “पुरानी सोच” कहकर ठुकरा दिया जाता है, जो रिश्तों में दरार की शुरुआत है।

क्या कहती है मनोविज्ञान?
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, अहंकार एक डिफेंस मेकनिज़्म होता है—लोग इसका उपयोग अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए करते हैं। लेकिन जब यह सीमा पार करता है, तो इंसान “संबंध” नहीं बल्कि “स्वार्थ” को प्राथमिकता देने लगता है। यही वह बिंदु है, जहां पारिवारिक संतुलन बिगड़ने लगता है।

कैसे पहचाने कि आप या कोई और अहंकारी बनता जा रहा है?
आप दूसरों की बातों को बीच में काटने लगे हैं।
आपके लिए आपकी राय सबसे अधिक मायने रखती है।
आपको माफ़ी माँगने या अपनी गलती स्वीकारने में कठिनाई होती है।
आप अपनों की आलोचना जल्दी करते हैं लेकिन तारीफ कम।
आपको लगता है कि घर में आपकी बात नहीं मानी जाती, इसलिए सब गलत हैं।

अहंकार से रिश्तों को कैसे बचाएं?
स्वीकार करें कि हर किसी की सोच अलग होती है:
सभी का नजरिया एक जैसा नहीं हो सकता। यदि कोई आपसे असहमत है तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह गलत है।

‘मैं’ से पहले ‘हम’ को रखें:
परिवार में सामूहिक सोच, सामूहिक निर्णय और सामूहिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता दें।

माफी मांगना कमजोरी नहीं है:
जहां जरूरत हो, विनम्रता से अपनी गलती मानना रिश्तों को मजबूत करता है।

बुजुर्गों और बच्चों की बात को महत्व दें:
वे अनुभव और मासूम दृष्टिकोण लेकर आते हैं, जो कई बार हमें सोचने का नया तरीका देते हैं।

खुद के व्यवहार का मूल्यांकन करें:
दिन में कुछ देर बैठकर सोचें—क्या मेरी किसी बात से किसी को चोट पहुंची? क्या मैं दूसरों को पर्याप्त सुन रहा हूं?

निष्कर्ष:
अहंकार वह दीमक है, जो रिश्तों को भीतर ही भीतर खा जाती है। यह धीरे-धीरे आत्मीयता को समाप्त करता है और परिवार के उस बंधन को कमजोर कर देता है, जो उसे जोड़ता है। इसलिए जरूरी है कि हम समय रहते अपने व्यवहार की समीक्षा करें और रिश्तों को बचाने के लिए ‘मैं’ को थोड़ा कम करके ‘हम’ को प्राथमिकता दें।अगर हर सदस्य थोड़ा झुके, थोड़ा समझे और थोड़ा माफ़ करे—तो कोई भी रिश्ता इतना कमजोर नहीं होता कि टूट जाए। क्योंकि परिवार एक मंदिर है, और उसमें अगर सबसे बड़ी मूर्ति रखनी हो, तो वो “विनम्रता” की होनी चाहिए।

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