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‘पिंजर’ से ‘चित्रलेखा’ तक, नारी की शक्ति और संघर्ष की कहानियां, जब सिनेमा में दिखी साहित्य की झलक

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नई दिल्ली, 13 फरवरी (आईएएनएस)। हिंदी साहित्य की रचनाओं पर आधारित कई फिल्मों ने नारी की शक्ति, संघर्ष और भावनाओं को प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया है। ये फिल्में उपन्यासों और कहानियों से प्रेरित होकर महिलाओं के मजबूत किरदारों को केंद्र में रखती हैं, जो समाज की कुरीतियों, प्रेम, बलिदान और स्वतंत्रता की कहानी कहती हैं।

हर साल 13 फरवरी को सरोजिनी नायडू की जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। सरोजिनी नायडू, जिन्हें ‘भारत कोकिला’ कहा जाता है, एक महान कवयित्री, स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक थीं। स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहीं और आजादी के बाद भारत की पहली महिला राज्यपाल बनीं और संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) का कार्यभार संभाला।

ये फिल्में हिंदी साहित्य की महिलाओं की ताकत को सिनेमा के माध्यम से अमर करती हैं, जो आज भी प्रेरणा देती हैं।

परिणीता साल 2005 में रिलीज हुई थी, जो शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित फिल्म है। इसमें विद्या बालन ने ललिता का किरदार निभाया। यह प्रेम कहानी समाज के दबाव, दहेज और ऊंच-नीच की समस्या पर केंद्रित है, जहां नारी अपनी भावनाओं और सम्मान की लड़ाई लड़ती है।

पिंजर साल 2003 में आई थी। अमृता प्रीतम के उपन्यास पर आधारित यह फिल्म भारत-पाकिस्तान विभाजन की त्रासदी में महिलाओं की स्थिति दिखाती है। उर्मिला मातोंडकर ने इसमें पुरो का किरदार निभाया, जो अपहरण और सामाजिक दबाव के बीच अपनी पहचान और मानवता की लड़ाई लड़ती है। फिल्म महिलाओं की पीड़ा और साहस को उजागर करती है।

साल 2001 में रिलीज हुई फिल्म ‘लज्जा’ किसी एक किताब की सीधी कहानी पर आधारित नहीं है। हालांकि, इसका टाइटल और मूल विचार बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन के साल 1993 में प्रकाशित उपन्यास ‘लज्जा’ से प्रेरित है। राजकुमार संतोषी की फिल्म में महिलाओं के शोषण, सामाजिक अन्याय, घरेलू हिंसा और नारी की गरिमा के संघर्ष को केंद्र में रखा गया है।

मोहन राकेश की कहानी पर आधारित फिल्म उसकी रोटी साल 1969 में रिलीज हुई थी, यह एक महिला के खामोशी से सहे दुख और रोजमर्रा के संघर्ष को चित्रित करती है। मणि कौल की यह फिल्म नारी की मौन शक्ति और पीड़ा को गहराई से दिखाती है।

भगवती चरण वर्मा के उपन्यास पर बनी क्लासिक फिल्म चित्रलेखा साल 1964 में आई थी, जो पाप-पुण्य की बहस को एक नर्तकी के माध्यम से उठाती है। फिल्म में मीना कुमारी ने चित्रलेखा का दमदार रोल निभाया, जो समाज की नैतिकता और स्त्री की स्वतंत्र इच्छा के बीच संघर्ष करती है। फिल्म दार्शनिक गहराई के साथ नारी शक्ति दिखाती है।

‘साहब बीबी और गुलाम’ साल 1962 में रिलीज हुई थी, बिमल मित्र के उपन्यास पर गुरुदत्त की क्लासिक फिल्म में मीना कुमारी ने छोटी बहू का किरदार निभाया। फिल्म बंगाली जमींदारी व्यवस्था में फंसी एक महिला की व्यथा और संघर्ष दिखाती है, जो समय के साथ बदलते समाज में अपनी पहचान खोती है।

–आईएएनएस

एमटी/एबीएम

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