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बॉक्सिंग के खिलाफ थे पिता, फिर भी नहीं मानी हार, यूं ही नहीं ‘चैंपियन’ हैं मैरी कॉम

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नई दिल्ली, 28 फरवरी (आईएएनएस)। बॉक्सिंग के खेल को पहले पुरुषों का गेम कहा जाता था। हालांकि, इस मानसिकता को भारत की दिग्गज महिला मुक्केबाज मैरी कॉम ने बदला। छह बार की वर्ल्ड चैंपियन मैरी कॉम ने अपनी करियर में हर वो बड़ी उपलब्धि हासिल की, जिसका एक खिलाड़ी सपना देखता है। मैरी कॉम ने साल 2012 के ओलंपिक में कांस्य पदक जीता। वहीं, एशियाई खेलों और कॉमनवेल्थ गेम्स में मैरी कॉम ने स्वर्ण पदक को अपने नाम किए।

मैरी कॉम का जन्म 24 नवंबर 1982 को मणिपुर के चुराचांदपुर जिले के कांगथेई गांव में हुआ था। मैरी कॉम के पिता किसान थे, ऐसे में बचपन काफी गरीबी में बीता। मैरी कॉम खेतों में माता-पिता के साथ काम करतीं और इसके साथ ही अपने भाई-बहनों की जिम्मेदारी भी संभाला करती थीं। बॉक्सिंग की दुनिया में छा जाने की प्रेरणा मैरी कॉम को साल 1998 में डिंग्को सिंह से मिली। डिंग्को ने 1998 में खेले गए एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीता था।

बस यहीं से मैरी कॉम ने तय कर लिया कि वह अपने पंचों से दुनियाभर की मुक्केबाजों को चारों खाने चित करेंगी। हालांकि, राह आसान नहीं थी, क्योंकि न तो अच्छी डाइट के पैसे थे और न ही परिवार का साथ। मैरी कॉम के पिता नहीं चाहते थे कि वह कभी बॉक्सिंग की रिंग में उतरे। मगर मैरी कॉम के सिर पर रिंग में छा जाने का जुनून सवार था।

मूलभूत सुविधाओं के अभाव के बावजूद मैरी कॉम काफी तेजी से मुक्केबाजी में नाम कमा रही थीं। साल 2005 में मैरी की ओनलर कॉम से शादी हो गई। ओनलर ने मैरी कॉम को हर कदम पर पूरा समर्थन दिया। मैरी कॉम करियर में ऊंचाइयों की तरफ बढ़ ही रहीं थीं कि साल 2007 में हुए जुड़वा बच्चों की वजह से उनके करियर में ठहराव आ गया। हालांकि, साल 2012 में हुए लंदन ओलंपिक में मैरी कॉम ने एक बार फिर जोरदार कमबैक किया और कांस्य पदक जीता।

मैरी कॉम ने रिकॉर्ड छह बार महिला विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। वह ऐसा करने वाली एकमात्र मुक्केबाज हैं। 2014 में हुए एशियाई खेलों और 2018 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में मैरी कॉम ने गोल्ड मेडल जीता। मैरी कॉम को 2006 में पद्मश्री और 2009 में राजीव गांधी खेल रत्न से भी नवाजा गया।

–आईएएनएस

एसएम/डीकेपी

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