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वीडियो में जाने कैसे ‘मैं’ की भावना इंसान को खुशी, रिश्तों और सम्मान से कर देती है दूर ? भयंकर परिणाम जान उड़ जायेंगे होश

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मनुष्य जीवन में सुख, शांति और संतुष्टि की खोज करता है। लेकिन अक्सर यही तलाश अहंकार की वजह से अधूरी रह जाती है। अहंकार एक ऐसा अदृश्य शत्रु है जो इंसान को भीतर से खोखला कर देता है। जब ‘मैं’ का भाव बढ़ने लगता है, तो रिश्तों में दरार पड़ जाती है, मित्रता में विश्वास कम हो जाता है और समाज में सम्मान भी धीरे-धीरे दूर हो जाता है। यही कारण है कि विद्वानों और संतों ने हमेशा कहा है – “अहंकार का त्याग करो, तभी जीवन में आनंद का मार्ग खुलता है।”

रिश्तों पर असर

अहंकार इंसान को अपने ही प्रियजनों से दूर कर देता है। जब व्यक्ति हर समय अपनी उपलब्धियों का बखान करता है या खुद को दूसरों से श्रेष्ठ मानता है, तो रिश्तों में मधुरता घटने लगती है। घर-परिवार में विवाद, समाज में अलगाव और मित्रता में दरार का सबसे बड़ा कारण यही ‘मैं’ बन जाता है। एक छोटा-सा उदाहरण लें – जब किसी परिवार में सदस्यों की राय का सम्मान न करके केवल अपनी बात को थोपने की कोशिश की जाती है, तो वह घर खुशहाल नहीं रह पाता।

कार्यस्थल पर नुकसान

कार्यक्षेत्र में भी अहंकार सफलता की राह में बाधा डालता है। एक अच्छे नेता या प्रबंधक के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी टीम की राय सुने और सबको साथ लेकर चले। लेकिन यदि वही नेता अहंकार में डूबा हो और केवल अपनी सोच को ही सर्वोच्च माने, तो उसकी टीम में असंतोष फैलना तय है। परिणामस्वरूप कार्य की गुणवत्ता और संगठन का विकास प्रभावित होता है।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण

धार्मिक और आध्यात्मिक ग्रंथों में अहंकार को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बताया गया है। भगवद्गीता में भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए कहा है कि अहंकार ज्ञान को ढक देता है और व्यक्ति को मोह-माया में फंसा देता है। संत कबीरदास ने भी कहा था – “जहाँ अहंकार, वहाँ प्रेम नहीं टिकता।” इसका अर्थ है कि जब तक ‘मैं’ का भाव रहेगा, तब तक सच्चे प्रेम और भक्ति का अनुभव संभव नहीं है।

समाज में सम्मान का ह्रास

अहंकारी व्यक्ति को समाज में भी लंबे समय तक सम्मान नहीं मिल पाता। हो सकता है कि उसकी उपलब्धियाँ और शक्तियाँ कुछ समय तक लोगों को आकर्षित करें, लेकिन जब लोग उसके व्यवहार में घमंड देखते हैं, तो धीरे-धीरे दूरी बना लेते हैं। इतिहास गवाह है कि अनेक राजाओं, नेताओं और प्रभावशाली व्यक्तियों ने केवल अपने अहंकार के कारण सब कुछ खो दिया।

अहंकार से मुक्ति का मार्ग

अहंकार को त्यागना आसान नहीं है, लेकिन यह असंभव भी नहीं। सबसे पहले व्यक्ति को यह स्वीकार करना होगा कि जीवन में जो भी उपलब्धियाँ हैं, वे केवल उसके प्रयासों का परिणाम नहीं, बल्कि परिस्थितियों, समाज और ईश्वर की कृपा का भी फल हैं। इस भावना से स्वाभाविक रूप से विनम्रता आती है।
ध्यान, साधना और आत्मचिंतन भी अहंकार को कम करने के प्रभावी साधन हैं। जब इंसान यह समझ लेता है कि उसका अस्तित्व व्यापक सृष्टि का एक छोटा-सा हिस्सा है, तो ‘मैं’ की भावना अपने आप कम हो जाती है।

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