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डॉक्यूमेंट्री से बना करियर: कैसे ‘फेस आफ्टर द स्टॉर्म’ ने बदली प्रकाश झा की जिंदगी

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मुंबई, 26 फरवरी (आईएएनएस)। प्रकाश झा आज बॉलीवुड के जाने-माने फिल्ममेकर हैं। उनके करियर का पहला बड़ा मोड़ उनकी डॉक्यूमेंट्री ‘फेस आफ्टर द स्टॉर्म’ से आया था। यह फिल्म उनके लिए सिर्फ एक डॉक्यूमेंट्री नहीं, बल्कि सफलता का पहला कदम साबित हुई। इसी फिल्म ने उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिलाया और उनके फिल्मी सफर की दिशा पूरी तरह बदल दी।

‘फेस आफ्टर द स्टॉर्म’ 1981 में बिहार के नालंदा जिले में हुए सांप्रदायिक दंगों पर आधारित थी। इस फिल्म में प्रकाश झा ने यह दिखाने की कोशिश की कि आम लोग हिंसा में कैसे शामिल हो जाते हैं और इसके पीछे सामाजिक और मानवीय कारण क्या हैं। उन्होंने स्थानीय लोगों से बातचीत करके यह समझने की कोशिश की कि हिंसा की स्थितियों में लोग अपने आप को क्यों खो देते हैं। फिल्म में यह भी दिखाया गया कि हिंसा का प्रभाव समाज के हर वर्ग पर होता है।

इस फिल्म को बनाने के लिए प्रकाश झा ने कठिन परिस्थितियों का सामना किया। उस समय वे अभी शुरुआती दौर में थे और फिल्मों की दुनिया में नया कदम रख रहे थे। वे पहले पेंटर बनना चाहते थे, लेकिन जब उन्हें यह अवसर मिला कि वे ऐसे सामाजिक मुद्दों पर फिल्म बना सकते हैं, तो उन्होंने पूरी मेहनत के साथ इस डॉक्यूमेंट्री पर काम किया।

‘फेस आफ्टर द स्टॉर्म’ के बाद ही उनकी पहचान एक गंभीर फिल्ममेकर के रूप में बनी। इस डॉक्यूमेंट्री को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार उनके करियर का बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। इस सफलता ने दर्शकों और आलोचकों दोनों का ध्यान आकर्षित किया।

इसके बाद उन्होंने फिल्मों की दुनिया में कदम रखा और 1984 में अपनी पहली फिल्म ‘हिप हिप हुर्रे’ बनाई। इसके बाद ‘परिणति’, ‘मृत्युदंड’, ‘दिल क्या करे’, ‘गंगाजल’, ‘अपहरण’, ‘राजनीति’, ‘आरक्षण’, ‘चक्रव्यूह’, ‘सत्याग्रह’, ‘जय गंगाजल’, ‘परीक्षा’, ‘खोया खोया चांद’, और ‘लिप्स्टिक अंडर माय बुर्खा’ जैसी फिल्में तैयार की।

आज प्रकाश झा बॉलीवुड में सक्रिय हैं और कई बेहतरीन प्रोजेक्ट्स बना रहे हैं।

–आईएएनएस

पीके/डीकेपी

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