मनुष्य का जीवन कई भावनाओं, अनुभवों और परिस्थितियों से गुज़रता है। इनमें से कुछ भावनाएँ उसे ऊँचाइयों तक ले जाती हैं, तो कुछ विनाश के मार्ग पर धकेल देती हैं। इन्हीं भावनाओं में सबसे खतरनाक और विनाशकारी है अहंकार। शास्त्रों और इतिहास में कई उदाहरण मिलते हैं जहाँ व्यक्ति अपनी प्रतिभा, ज्ञान, धन या शक्ति के बल पर इतना अहंकारी हो गया कि अंततः उसका पतन निश्चित हो गया। अहंकार को यूँ ही जीवन का सबसे गहरा अँधेरा नहीं कहा गया है, क्योंकि यह व्यक्ति की बुद्धि को ढक देता है और उसके विवेक को नष्ट कर देता है।
अहंकार की परिभाषा और स्वरूप
अहंकार का अर्थ है – स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मान लेना और अपनी शक्ति, धन या उपलब्धियों पर अत्यधिक गर्व करना। यह भाव धीरे-धीरे व्यक्ति के भीतर ऐसा ज़हर घोलता है, जो उसे वास्तविकता से दूर कर देता है। जब इंसान में विनम्रता खत्म हो जाती है और उसका पूरा ध्यान केवल अपनी उपलब्धियों पर केंद्रित हो जाता है, तो वहीं से अहंकार जन्म लेता है।
धार्मिक दृष्टि से अहंकार
हिंदू धर्म के शास्त्रों और पुराणों में अहंकार को मनुष्य के विनाश का प्रमुख कारण बताया गया है। रामायण में रावण, महाभारत में दुर्योधन और हिरण्यकश्यप जैसे असुरों के पतन का कारण उनका अहंकार ही था। रावण अपनी शक्ति और ज्ञान के बावजूद अहंकार में डूबा रहा और भगवान राम के हाथों उसका वध हुआ। इसी तरह, दुर्योधन का अहंकार ही उसे धर्मयुद्ध में विनाश की ओर ले गया। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि चाहे व्यक्ति कितना ही सामर्थ्यवान क्यों न हो, अहंकार उसे पतन की ओर ले जाता है।
समाज पर अहंकार का असर
अहंकारी व्यक्ति केवल स्वयं का ही नुकसान नहीं करता, बल्कि उसके व्यवहार से समाज भी प्रभावित होता है। अहंकार से भरा इंसान दूसरों की बातों को सुनना पसंद नहीं करता, वह सबको अपने से कमतर मानता है। इससे रिश्तों में दरार आ जाती है और व्यक्ति धीरे-धीरे अकेला पड़ जाता है। कार्यक्षेत्र में भी अहंकार व्यक्ति को सहयोगियों से दूर कर देता है, जिससे टीमवर्क और सामूहिक प्रगति प्रभावित होती है। समाज में उसका सम्मान धीरे-धीरे कम होने लगता है।
व्यक्तिगत जीवन पर अहंकार के परिणाम
अहंकार इंसान की खुशियों को भी छीन लेता है। जो व्यक्ति केवल स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, वह कभी दूसरों के सुख-दुख में सहभागी नहीं बन पाता। अहंकार रिश्तों को तोड़ता है, मन में तनाव और चिड़चिड़ापन बढ़ाता है। मानसिक शांति धीरे-धीरे खत्म होने लगती है और इंसान भीतर से खोखला महसूस करने लगता है।
आधुनिक जीवन में अहंकार
आज की दौड़-भाग भरी ज़िंदगी में सफलता पाना हर किसी की चाहत होती है। लेकिन कई बार यह सफलता व्यक्ति में अहंकार भर देती है। चाहे वह आर्थिक प्रगति हो, उच्च पद हो या ज्ञान का अभिमान, अगर यह विनम्रता के साथ संतुलित न हो, तो यह इंसान के जीवन को नकारात्मक दिशा में मोड़ देता है। सोशल मीडिया के दौर में भी लोग अपने दिखावे और लोकप्रियता पर गर्व करते हुए अक्सर अहंकार के शिकार हो जाते हैं। यह स्थिति व्यक्ति की असली पहचान और आत्मिक शांति को नष्ट कर देती है।
अहंकार से बचने के उपाय
अहंकार से बचने का सबसे बड़ा उपाय है विनम्रता और आत्मचिंतन। इंसान को हमेशा याद रखना चाहिए कि उसकी उपलब्धियों के पीछे ईश्वर की कृपा, परिवार का सहयोग और समाज का योगदान है। नियमित ध्यान और साधना मन को शांत करती है और अहंकार को कम करती है। दूसरों की सहायता करना, आभार प्रकट करना और आलोचना को सकारात्मक रूप से लेना भी अहंकार से दूरी बनाने के उपाय हैं।








